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बॉलीवुड अभिनेत्री शबाना आज़मी विवादों में प्रतिमा के जरिये हिन्दू धर्म को कहा भला-बुरा

“”बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, दूसरी बीवी सुभान अल्लाह”

बॉलीवुड अभिनेत्री शबाना आज़मी विवादों में प्रतिमा के जरिये हिन्दू धर्म को कहा भला-बुरा

मुंबई : इंद्रदेव पांडे

कुमारटुली से शुरू करते हैं। कुमारटुली से इसीलिए, क्योंकि वहाँ के लोगों के कारण बंगाल की दुर्गा पूजा में वो रौनक आती है, जो शायद ही कहीं और रहती हो। नार्थ कोलकाता के शोभाबाजार के पास स्थित कुमारटुली में ही वो लोग रहते हैं, जो माँ दुर्गा की कई भव्य मूर्तियों का निर्माण करते हैं, जो इंटरनेट पर वायरल होती हैं और जिनका दर्शन लाखों करोड़ों लोग करते हैं। त्योहारों के मौसम में लोग उनके पास जाते हैं, चाय-पानी पीते हैं, उनसे बातचीत करते हैं और अपनी प्रतिमाओं का ऑर्डर देते हैं। बड़े-बड़े पंडालों के आयोजक उनके पास जाकर बैठते हैं। कुछ लोग ऑर्डर की हुई प्रतिमाओं का निरिक्षण करने जाते हैं। पत्रकार उन मूर्तिकारों का इंटरव्यू लेते हैं। अमेरिका, यूके और नूजीलैंड तक के लोग उनसे मिलते हैं।

ये थी असली बात। अब आते हैं बनावटी बात पर। बनावटी बात, यानी उसे मैन्युफैक्चर करने वाले बनावटी लोग। बनावटी नैरेटिव, यानी उसे फैलाने वाली बनावटी विचारधारा। शबाना आज़मी के हाल ही के ट्वीट पर ग़ौर कीजिए। जावेद अख़्तर तो दिन भर में इतने लोगों से लड़ते-झगड़ते हैं कि उनके ट्वीट्स खोजने मुश्किल हैं लेकिन उनकी पत्नी उनसे कम ट्वीट करती हैं। शबाना आज़मी ने एक अंग्रेजी कविता के रूप में ‘मूर्तिकारों की दुर्दशा’ का वर्णन किया है। इस ‘दर्दनाक’ और ‘समाज की दयनीय स्थिति का सच्चा चित्रण करने वाले’ चित्र में एक मूर्तिकार गणेश भगवान की प्रतिमा बनाते समय उनसे कहते है:

“जब तक मैं तुम्हारी नक्काशी में व्यस्त था
तब तक तुम सिर्फ़ एक पत्थर थे
अब जब मेरा काम ख़त्म हो गया है
तुम भगवान बन गए हो
लेकिन मेरा क्या?
मैं तो ठहरा अछूत”

कितना दुःख-दर्द है न इस कविता में? कितनी चिंतित दिखती हैं न शबाना आजमी ग़रीबों के लिए। और हाँ, कितना आसान है न हर समस्या को (अगर वो नहीं है तो मैन्युफैक्चर कर के) हिंदुत्व, हिन्दू समाज और हिन्दू देवी-देवताओं से जोड़ना? जो मूर्तिकार भगवान गणेश की मूर्ति बनाता है, उसी मूर्तिकार को गणेश के भक्त अछूत मानते हैं। यही सन्देश है न इस कविता का? हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को लेकर यह प्रोपेगंडा नया नहीं है। ‘रेड लेबल टी’ के प्रचार में भी एक मुस्लिम शिल्पकार को दिखाया गया था। वो काफ़ी प्रेम से भगवान गणेश की मूर्तियाँ बना रहा था जबकि हिन्दू गणेश भक्त उसकी पहचान जानकर उससे मूर्ति लेने का इच्छुक नहीं था। कितने दकियानूसी ख्यालों वाले हैं न ये हिन्दू?

सबसे बड़ी बात तो ये है कि जावेद अख्तर की पत्नी शबाना आज़मी ने जिस मूर्ति को लेकर भारत में हिन्दुओं की छुआछूत पर निशाना साधा है, वो कम्बोडियन गणेश की प्रतिमा है। अर्थात, गणेश की प्रतिमा की इस रूप में कम्बोडिया में पूजा की जाती है। प्रतीत होता है कि ये मूर्तिकार भी कम्बोडिया का ही है। तो क्या अब शबाना आज़मी कम्बोडिया से उदाहरण लेकर भारत के हिन्दुओं पर निशाना साध रही हैं? क्या उन्होंने कभी बकरीद पर बकरे न काटने की सलाह दी है? क्या उन्होंने बकरीद पर ख़ून से सनी सड़कों की फोटो शेयर कर अपने मजहब के लोगों को कोई सीख दी है? नहीं।

अब आइए आपको सच्चाई से अवगत कराने का समय आ गया है। कुछ न कुछ खामियाँ हर प्रोफेशन में है लेकिन मूर्तिकारों को अछूत बता कर शबाना आजमी ने उनका अपमान किया है, उनकी कथित पीड़ा नहीं दिखाई है। साउथ मुंबई से २ घंटे के रास्ते पर पेन नामक एक गाँव है, जहाँ १५,००० लोग मिल कर प्रतिवर्ष गणेश जी की ७ लाख मूर्तियाँ बनाते हैं। उन्हें इसके लिए महीनों मेहनत करनी होती है। आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि इनमें से एक चौथाई मूर्तियाँ तो विदेशों में एक्सपोर्ट की जाती है। १० करोड़ रुपए के सालाना टर्नओवर वाली मूर्तिकारों की यह जमात सैकड़ों सालों से इस बिजनेस में लगी हैं।

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