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वो बचपन की अमीरी न जाने कहां खो गई, जब पानी में हमारे भी जहाज चलते थे – लियाकत शाह

वो बचपन की अमीरी न जाने कहां खो गई, जब पानी में हमारे भी जहाज चलते थे – लियाकत शाह

लॉक डाऊन मे ये ऐक दिल को छू लेने वाली दास्तान, सात अप्रैल की रात एक साहब के निशानदेही पर एक सफ़ेद पोश खानदान को राशन देने के बाद, जब घर लौटने के लिए चौक से गुज़र रहे थे, तो हर तरफ अंधेरे और घटाटोप का राज था। ऐसे अँधेरे में एक धीमी सी आवाज़ आयी! “भाई मदत किजीये” मैं ये सोचकर नज़रअंदाज़ करना चाहा कि एक पेशेवर गदागर होगा, लेकिन दिल में ख़्याल आया कि अगर एक पेशेवर होता तो इस वक्त अंधेरे में यूँ खड़ा नहीं होता, गाड़ी रोक कर पास गया और देखा अंधेरे में एक आदमी मुंह पर हाथ रखे खड़ा है। “जी भाई आपको कैसी मदद चाहिए? और अंधेरे में यूँ मुंह ढँके क्यों खड़े हो? अपना हाथ हटाइये।” मेरे कहने पर उसने अपने हाथ चेहरे से हटा लिए। उस ऐक ईश्वर अल्लाह की पनाह उस शख्स के गाल आंसुओं से भरे हुए थे और घुटी घुटी आवाज में रो रहा था, दोनों हाथों को अपने गालों से हटाकर माफी माँगने के अंदाज में हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, और अपना सिर नीचे झुका लिया। मैं इस अंधेरे में भी उसके आंसूओं को थोड़ा टपकता देख सकता था, और अंदर ही अंदर कुछ टूटता हुआ महसूस होने लगा, आगे बढ़ा और दुबारा हमदर्दी से पूछा। “भाई, कुछ तो कहिए” कुछ कहने के बजाय वह शख्स आगे बढ़ा और गले लगकर धहाड़ें मारके रोने लगा और कहने लगा “भाई मेरे भाई मैं खुद भूखा रह लूँगा लेकिन मुझेसे अपनी दो छोटी बच्चियों की भूख देखी नहीं जाती। उनका भूख से तड़पना, बिलखना मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। कल से घर पर खाने को एक दाना नहीं है।” और मेरी बच्चियो को सुबह से बहोत भूख लगी है, वो केहते है बाबा भूख लगी है, बाबा खाना खिलाओ की फरयाद कर रही हैं। भाई, जिन्दगी में कभी ऐसा नहीं हुआ है कि मेरी बच्चियां भूखी सोयी हुई हो। रोजाना खाने के साथ बच्चियों के लिए कुछ फल भी लाता था आज बच्चियां कह रही हैं हमें फल मत दो, हम ज़िद नहीं करेंगी। लेकिन आप हमें सिर्फ खाना तो दे दो। बाबा आप तो हमारी हर बात मानते थे, अभी हम खाना मांग रहे हैं तो खाना क्यों नहीं दे रहे हो? साहब मैं फक़ीर नहीं हूँ। इस लॉक डाउन की वजह से हालात ऐसे हो गए, मैने उस ईश्वर खुदा के अलावा कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। साहब आप घर चलकर देखलो कि आटे का एक ज़र्रा भी निकले तो जो चोर की सजा वो मेरी होगी। आप मेरा आईडी कार्ड रख लो। बस मेरी बच्चियों को चलकर अपने हाथ से खाना दे दो मैं और मेरी बीवी भूखे ही सो जाएंगे। यह कहकर वे शख्स फिर से फूट फूट कर रोने लगा। मेरे दिल में ख्याल आया कि मैं भी बेटी का बाप हूँ। खुदा ना करे मेरी बेटी पर कभी ऐसा वक्त कभी ना आये कभी नहीं। अल्लाह की क़सम दिल फटता महसूस होने लगा। सारा जिस्म कांप सा गया ज़बान जैसे बोलना भूल गयी थी। खामोशी से उस शख्स को गाड़ी में बिठाया और घर की तरफ चल दिया, दौराने सफर उसने बताया कि मेरा नाम साबिर है। १३ साल से घरों को रंग देने का काम कर रहा हु। मेहनत मजदूरी करके अपना गुज़र बसर कर रहा हु। लेकिन लॉक डाउन की वजह से हालात ख़राब हो गए। जान पहचान वालों से माँगने की हिम्मत नहीं हुई। घर पहुंचकर मैंने राशन के थेले गाड़ी में रखे और साबिर के घर की जानिब रवाना हो गया। घर क्या था बस एक कमरा था, वही ड्राइंग रूम, वही बेडरूम और वही रसोई, ना सोफे और ना ही बिस्तर, ना ही अलमारी और ना ही फ्रिज। बस एक कोने में, बुझा चूल्हा साबिर की मुफलिसी को मुँह चिड़ा रहा था, और दूसरे कोने में दो फूल सी बच्चियां भूख की चादर ताने सो रही थीं। साबिर की बेगम ने कहा कि भाई साहब जब लड़कियों का रोना बर्दाश्त नहीं हुआ, तो मैंने खांसी की दवा का शरबत पिलाकर सुला दिया। अंदर रूह तक जेसै किसी ने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया हो। सिसकते दिल, कंपकपाते हाथों और नम आँखों के साथ, कमरे के कोने में राशन के थैले रखे और, बच्चियो पर प्यार भरी नज़र डालकर, इस दुआ के साथ साबिर के घर से बाहर निकल गया कि “ऐ हमारे रब ईश्वर! इन बच्चियो के नसीब अच्छे फरमा, अपनी मख़लूक़ पर रहम फरमा, भूखों की मदद फरमा आमीन। आप सभी अपने अपने मोहल्ले में पता करें कि क्या कोई साबिर या सतीश आपकी गली में तो नहीं रहता है? क्योंकि मांगने वाले फकीर का टेंशन नहीं है, ऐसे लोगों का बूरा हाल है। एक बार यह छोटा सा दर्द पूरा पढ़ कर अपने ऊपर गौर करके देखिए कि अगर साबिर की जगह मैं खुद होता तो क्या होता। यह भी अपने आप से सवाल कीजिए कि मैं ग़रीबों की कितनी मदद कर सकता हूँ और अब तक कितनी की है? ग़रीबों की हालत खराब है, अपने ख़जा़ने के दरवाजे खोलिए, आपका ख़जा़ना कभी भी कम नहीं होगा। ईश्वर अल्लाह इसको कई गुना बढ़ा कर जरूर देगा। आप लोग भी अपने पडोस करीबी रीश्तेदार मोहल्ले के वो लोग जो साबीर हो या सतीश, अब्दुल रहीम हो राम किसी भी जाती का हो या कोई भी धर्म के हिंदू, मुस्लीम, सिख, इसाई ये वो लोग है जो कभी गरीब या फकीर नही थे बस इस लॉक डाऊन के वजा से वो लोग बेरोजगार, बेसहारा, लाचार और मजबूर हो गये। खास कर वो लोग जो रोज कामाकर लाते और अपनी जीन्दगी खुशहाली से गुजरते थे। ये रोज के कामाने वाले फकीर या भिकारी नही है होते। ये लोग लॉक डाऊन कि वजा से अस्या और मजबूर हो गये वारना ये लोगो मे हम अमिरो से भी कई ज्यादा खुद्दारी है। ये हम जैसे लोगो के मोहताज नही होते। उनके हाथ सिर्फ ऐक ईश्वर कि तरफ उठते है क्यू कि उनके हाथो के छांलो के सामने कोई भी मेह्नत का काम छोटा या बडा नही होता। उनकी रोज्मराह कि हिम्मत और काम कि लगन से पैसा खुद चलकर उनकी देह्लीज पे चल कर आता है।
कुरान मे है “और अच्छा व्यवहार करते रहो निकटतम और दूर के पड़ोसियों के साथ भी” (कुरान सूरह अन निसा आयत ३६) ठीक उसी तरह हदीस मे प्रेषित मोहम्मद सलल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “वोह शख्स मोमिन नहीं जो पेट भर कर खाए और उसका पड़ोसी भूखा रह जाए”

लियाकत शाह (एमए बी.एड)
महाराष्ट्र राज्य कार्यकारी समिति सदस्य,
अखिल भारत जर्नालीस्ट फेडरेशन

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