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बुर्कानशी उज़्मा की मंदिर को सैनेटाइज करने वाली कहानी, जीत रही सबका दिल

बुर्कानशी उज़्मा की मंदिर को सैनेटाइज करने वाली कहानी, जीत रही सबका दिल


(लियाकत शाह)
एक मुस्लिम लड़की ने अपने इलाके में कोरोना के संक्रमण को रोकने का बीड़ा उठाया है। बुर्का ओढ़े और कमर पर सेनेटाइजर को टंकी बांधे उजमा ने अपनी गली के मंदिर को सैनेटाइज कर इस काम की शुरुआत की। उज़मा रोज़ाना अपने इलाके की गलियों समेत मंदिर मस्ज़िद व गुरद्वारों को सेनेटाइज करती है।

ताकि यहां इबादत करने वालो को इस वायरस से कोई ख़तरा ना हो। इस नेक काम के लिए उजमा अब तक अपनी जेब से तकरीबन एक लाख रुपया खर्च कर चुकी है। उजमा का ये नेक कदम नफ़रत भरे इस दौर में इंसानियत के ज़ख्मों पर मरहम का काम कर रहा है। अपने इस नेक काम पर उजमा का कहना है कि सब इबादत गाहे अल्लाह और भगवान का घर है, और इनसे सभी की आस्था जुड़ी होती है।

इबादत गाहे अक्सर मनुष्य के मन की वायरस को खत्म करती है और उसको बेहतर इंसान बनने में मदद करती है। ऐसे में इन इबादत गाहों को वायरस से बचाने का मनुष्य को करना होगा। उजमा उस दौर में सौहार्द और इंसानियत की मिसाल बन कर सामने आयी है जब मुसलमानो को कोरोना फैलाने का ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है।

उजमा का कहना है कि जिस प्रकार मेरे लिए मेरा परिवार महत्व रखता है उसी प्रकार मेरा समाज और मेरा भारत देश भी मेरे लिए उतना ही महत्व रखता है। और इसकी हिफाज़त करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

उजमा ने अपने इस नेक काम से न केवल सांप्रदायिक दीवार को गिराने की कोशिश की है बल्कि उसने औरत और मर्द के काम के भेद को भी कम किया है। रोज़ाना लगभग २० किलो सेनेटाइजर की टंकी कमर पर लाद कर उजमा गाली गली जा कर वायरस को ख़त्म करने की कोशिश करती है।

उसने न सिर्फ कोरोना के वायरस बल्कि समाज के तमाम वायरस को मिटाने की कोशिश है। जिसमे कुरीतियों, अंधविश्वास और महिलाओं के लिए पुरुष की मानसिक सोच के वायरस भी शामिल है।

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