Entertainment

अगर हो हक़ पे तो फिर क्यू डरें सज़ा से भी चिराग़ सोच के लड़ता रहा हवा से भी

🏵ग़ज़ल🏵

अगर हो हक़ पे तो फिर क्यू डरें सज़ा से भी
चिराग़ सोच के लड़ता रहा हवा से भी

दुआ में होती है तासीर है ये सच लेकिन
बचाना ख़ुद ज़रूरी है बद दुआ से भी

जुड़े जुड़े से थे जो हम से इक ज़माने से
वो ज़माने से अब हैं जुदा जुदा से भी

किसी किसी को मिरा इन्किसार खलता है
किसी किसी को गिला है मिरी अना से भी

तलब है दिल में तो फिर दिल से माँग कर देखो
वही मिलेगा जो माँगोगे तुम खुदा से भी

जो ज़ेहनो दिल ही हों हुब्बे खुदा से खाली तो
गुनाह रुक नही सकते किसी सज़ा से भी

तू लाख हो गया ओझल मिरी निगाहों से
मैं ढूंढ़ लूँगी तुझे तेरे नक़्शे पा से भी

तिरे बगैर ये आलम भी हम पे गुज़रा है
लिपट के रोए अक्सर तिरी क़बा से भी

डॉक्टर अम्बर आबिद
भोपाल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *