अमेरिका को फर्स्ट” और “महान बनाने की नीति” से विश्व पिता बनने की और ट्रंप जा रहे हैं? इस नीति के इतिहास सहित हर पहलू को जाने

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ट्रम्प सरकार, अमेरिका से प्रवासियों द्वारा अपने देश धन भेजने पर 5% कर का प्रस्ताव लाई,

 

भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में अहम भूमिका हैं इस धन प्रेक्षण (रेमिटेंस) की,

विक्रम सेन

 

नई दिल्ली। ट्रंप प्रशासन विदेश भेजे जाने वाले पैसे (धन प्रेषण) यानी रेमिटेंस पर 5% टैक्स लगाने की योजना बना रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के “बड़ा, सुंदर विधेयक” लाया है।

 

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को भारी कर्ज और घाटे से उबरने के समाधान हेतु ट्रंप सरकार द्वारा टैरिफ चार्ज नीति के साथ रेमिटेंस का प्रस्ताव भी शामिल है।

 

बता दें कि ‘अमेरिका को फर्स्ट और महान बनाने की नीति’ के वादे पर दूसरी बार विजय प्राप्त करने वाले राष्ट्रपति ट्रंप ने रेमिटेंस से अमेरिकन को पूरी तरह छूट प्रदान की है, लेकिन सभी देशों के प्रवासी वर्करों को इस नीति का शिकार बनना होगा।

रेमिटेंस आम तौर पर एक अच्छे व्यक्ति या परिवार के सदस्य से दूसरे व्यक्ति या परिवार को किया जाने वाला हस्तांतरण होता है। विश्व बैंक के अनुसार, काम के देश से वापस अपने देश में धन की आवाजाही को धन प्रेषण के रूप में जाना जाता है।

रेमिटेंस लंबे समय से निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है, और यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह और ओडीए के संयुक्त प्रवाह से अधिक रहा है।

 

डोनाल्‍ड ट्रंप प्रशासन के रेमिटेंस पर बिल में क्या है

 

‘इसके अनुसार, रेमिटेंस पर 5% का टैक्स लगेगा। यह टैक्स पैसे भेजने वाले को देना होगा।’ इसका मतलब है कि जो भी व्यक्ति अमेरिका से विदेश में पैसे भेजेगा, उसे 5% टैक्स देना होगा। यह टैक्स हर तरह के अंतरराष्ट्रीय रेमिटेंस पर लगेगा। लेकिन, यह टैक्स उन लोगों पर नहीं लगेगा जो ‘वेरीफाइड यूएस सेंडर’ हैं।

‘वेरीफाइड यूएस सेंडर’ का मतलब अमेरिका के नागरिक से है।

 

बिल में कहा गया है, ‘यह टैक्स रेमिटेंस सर्विस देने वाली कंपनियों को लेना होगा। फिर, इन कंपनियों को यह टैक्स हर तीन महीने में ट्रेजरी के सेक्रेटरी को जमा करना होगा।’ इसका मतलब है कि जो कंपनियां विदेश में पैसे भेजने की सुविधा देती हैं, उन्हें यह टैक्स वसूलना होगा और सरकार को देना होगा। इस बिल में कोई कम से कम सीमा नहीं तय की गई है। इसका मतलब है कि छोटे से छोटे लेनदेन पर भी टैक्स लगेगा।

 

ये कर धन-प्रेषण सेवा प्रदाता द्वारा स्थानान्तरण के समय ही रोक लिए जाएंगे, जिससे पारंपरिक बैंक स्थानान्तरण और एनआरई/एनआरओ खाता लेनदेन दोनों प्रभावित होंगे।

 

प्रस्तावित विधेयक में कहा गया है, “यह प्रावधान वैध सामाजिक सुरक्षा संख्या वाले करदाताओं द्वारा भुगतान किए जाने वाले किसी भी उत्पाद शुल्क के लिए वापसी योग्य कर क्रेडिट भी प्रदान करता है। अंत में, प्रावधान में एक एंटी-कंड्यूट नियम भी है।”

 

इस बिल के लागू होने से भारतीयों के लिए अमेरिका से घर पैसा भेजना महंगा हो जाएगा। अनुमान है कि इस टैक्स से अमेरिका में रहने वाले भारतीयों पर हर साल 1.6 अरब अमेरिकी डॉलर से ज्यादा का बोझ पड़ेगा।

 

रिजर्व बैंक के मार्च बुलेटिन में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है, “भारत के कुल प्रेषण में अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे बड़ी बनी हुई है, जो 2020-21 में 23.4 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 27.7 प्रतिशत हो जाएगी।”

भारतीय विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में लगभग 54 लाख प्रवासी भारतीय हैं, जिनमें लगभग 33 लाख भारतीय मूल के व्यक्ति (पीआईओ) शामिल हैं।

इस कदम से बड़ी संख्या में H1B और L1 वीजा धारक प्रभावित हो सकते हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में भारतीय कामकाजी पेशेवर हैं। राज्यसभा में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर 2022 और सितंबर 2023 के बीच जारी किए गए सभी H-1B वीजा में से 70% से अधिक भारतीय कुशल श्रमिकों को मिले हैं।

इनमें से अधिकतर ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अभी तक अमेरिका की नागरिकता हासिल नहीं की है।

 

विश्व बैंक ने दिसंबर 2024 में कहा कि भारत 2008 से धन प्रेषण का शीर्ष प्राप्तकर्ता रहा है, विश्व धन प्रेषण में इसकी हिस्सेदारी 2001 में लगभग 11 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में लगभग 14 प्रतिशत हो जाएगी।

 

विश्व बैंक ने कहा, “वर्ष 2024 में धन प्रेषण के लिए शीर्ष पांच प्राप्तकर्ता देश भारत होंगे, जहां अनुमानित प्रवाह 129 बिलियन डॉलर होगा, इसके बाद मैक्सिको (68 बिलियन डॉलर), चीन (48 बिलियन डॉलर), फिलीपींस (40 बिलियन डॉलर) और पाकिस्तान (33 बिलियन डॉलर) का स्थान होगा।”

रेमिटेंस को भारत की ताकत माना जाता है। यह विदेशी मुद्रा का अहम जरिया है।

 

‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का क्रियान्वयन हैं रेमिटेंस बिल

 

ट्रम्प का “बड़ा, सुंदर विधेयक” शायद भारी कर्ज और घाटे का समाधान टैरिफ चार्ज नीति और रेमिटेंस हैं।

अमेरिकन ट्रेजरी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 के पहले छह महीनों के लिए अमेरिकी बजट घाटा रिकॉर्ड 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो रिकॉर्ड पर दूसरा सबसे ऊंचा छह महीने का स्तर है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का तथाकथित “बड़ा, सुंदर विधेयक” देश के बढ़ते कर्ज और घाटे को दूर करने में विफल हो सकता है।

 

अमेरिका संभवतः सकल घरेलू उत्पाद के 7.0 प्रतिशत से अधिक घाटे पर हैं, और संभवतः इससे भी अधिक, यदि अमीर लोग यह तय करते हैं कि उन्हें करों का भुगतान नहीं करना है।

वरिष्ठ फेलो गैरी क्लाइड फबाउर ने कहा कि, घाटा बढ़ेगा और ऋण/जीडीपी अनुपात में वृद्धि जारी रहेगी। घाटा बढ़ने की वजह को रोकने हेतु, रिपब्लिकन “घाटे को छिपाने के लिए विभिन्न लेखांकन चालों का उपयोग करेंगे, इसके तहत नए बिल लाए जा रहे हैं जिसमें टैरिफ और रेमिटेंस भी हैं।

रिपब्लिकन नई आवश्यकताओं के साथ “बचत” उत्पन्न करना चाह रहे हैं, लेकिन डेमोक्रेट्स ने चेतावनी दी है कि लाखों अमेरिकी कवरेज खो देंगे।

 

अमेरिका फर्स्ट” और “महान बनाने की नीति” के इतिहास और सारे पहलुओं को जाने

 

ट्रंप ने जनवरी, 2017 में राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले भाषण में आधिकारिक रूप से ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का आरंभ किया था. उन्होंने कहा था, “आज यहां इकट्ठे हुए हम सभी लोग एक नया आदेश जारी कर रहे हैं, जिसे हर शहर में, हर देश की राजधानी में और सत्ता के हरेक गलियारे में सुना जाएगा. आज से हमारा देश एक नई दृष्टि से चलेगा. आज से केवल अमेरिका फर्स्ट होगा – अमेरिका फर्स्ट.” उसके बाद से वह कुछ और सोचे बगैर इसी नीति को आगे ले जाने में लगातार जुटे रहे हैं। लेकिन अमेरिका फर्स्ट नीति है क्या? यह बेहद राष्ट्रवादी नीति है, जो अमेरिका के हितों को सबसे ऊपर रखती है. यह सभी राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधी रूपों में अमेरिकी राष्ट्रवाद की बात करती है.

 

अमेरिका फर्स्ट” और “महान बनाने की नीति” दोनों अमेरिकी इतिहास और राजनीति में महत्त्वपूर्ण अवधारणाएं हैं.

वैसे अमेरिका फर्स्ट के नारे का इतिहास बहुत लंबा और विवादास्पद रहा है। 1916 में जब प्रथम विश्व युद्ध चरम पर था तब राष्ट्रपति चुनाव अभियान में हैरल्ड विल्सन ने देश में युद्ध-विरोधी तथा अलग-थलग रहने वाली भावनाओं को काबू में करने के लिए अमेरिका फर्स्ट नारे का इस्तेमाल किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान येल विश्वविद्यालय के छात्रों ने अमेरिका फर्स्ट कमिटी (एएफसी) का गठन किया था। एएफसी को उस समय की बड़ी हस्तियों का समर्थन मिला था, जिनमें उड़ान भरने वाले राष्ट्रीय नायक चार्ल्स लिंडबर्ग और मशहूर कार कंपनी के मालिक हेनरी फोर्ड शामिल थे. अलग रहने की मंशा और ब्रिटेन विरोधी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने वाली एएफसी ने द्वितीय विश्व युद्ध में अमेरिका की भागीदारी का विरोध किया. कई इतिहासकारों ने उसे यहूदी विरोधी भावनाओं वाला भी बताया है।

अमेरिका फर्स्ट के जुमले या उससे मिलते-जुलते नारों का इस्तेमाल अतीत में भी हुआ है. राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी मैकेन ने अपने चुनाव अभियान में ‘कंट्री फर्स्ट’ का इस्तेमाल किया और रीगन ने 1980 के अभियान में कहा, “हम अमेरिका को एक बार फिर महान बनाएं.” ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट नीति से जुड़े अपने भाषणों में इस जुमले का इस्तेमाल बार-बार किया है. इस तरह अमेरिका फर्स्ट केवल तीव्र अमेरिकी राष्ट्रवाद का ही प्रतीक नहीं है बल्कि अलग-थलग रहने, संरक्षणवाद और हस्तक्षेप नहीं करने की बात भी कहता है.

 

2000 में राष्ट्रपति चुनावों के लिए अभियान के दौरान रिफॉर्म पार्टी के प्रत्याशी पैट बुकानन ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसी संस्थाओं को खत्म करने की वकालत करते हुए इस नारे का इस्तेमाल किया था.

 

“अमेरिका फर्स्ट” एक ऐसी नीति है जो राष्ट्र के हित को अन्य सभी चीजों से ऊपर रखती है. यह अक्सर अमेरिका के लिए एक मजबूत राष्ट्रवाद, अलगाववाद, और संरक्षणवादी नीतियों का समर्थन करती है. “महान बनाने की नीति” का मतलब है कि अमेरिका को पहले से भी बेहतर और शक्तिशाली बनाना है, जो अक्सर एक आदर्शवादी या रोमांटिक अतीत को बढ़ावा देता है.

इन दोनों अवधारणाओं को डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति पद के दौरान “अमेरिका को फिर से महान बनाओ” नारे के रूप में इस्तेमाल किया गया था. यह नारा एक पॉप संस्कृति घटना बन गया और इसे ट्रम्प के राष्ट्रपति पद के समर्थकों और विरोधियों दोनों द्वारा इस्तेमाल किया गया है.

 

अमेरिका फर्स्ट नीति से ट्रंप विश्व पिता बनने की और बढ़ रहे हैं?

 

“अमेरिका फर्स्ट” की नीति के दो मुख्य पहलू हैं:

आर्थिक संरक्षणवाद:

यह नीति अमेरिका के उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए उच्च शुल्क और व्यापार बाधाओं का समर्थन करती है.

आप्रवासन पर प्रतिबंध:

यह नीति विदेशी प्रवासियों को अमेरिका में आने से रोकने के लिए सख्त आव्रजन नियमों का समर्थन करती है.

“महान बनाने की नीति” का अर्थ है:

अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना:

यह नीति अमेरिका की अर्थव्यवस्था को फिर से पहले से भी बेहतर बनाने के लिए आर्थिक सुधारों का समर्थन करती है.

अमेरिकी मूल्यों को बढ़ावा देना:

यह नीति अमेरिकी मूल्यों और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सांस्कृतिक और सामाजिक सुधारों का समर्थन करती है.

अमेरिकी शक्ति को बढ़ाना:

यह नीति अमेरिका की सैन्य शक्ति और वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों का समर्थन करती है.

इन दोनों अवधारणाओं के बीच संबंध यह है कि “अमेरिका फर्स्ट” नीति का उद्देश्य “महान बनाने की नीति” को लागू करना है। दूसरे शब्दों में, “अमेरिका फर्स्ट” नीति अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए आवश्यक कदम उठाने का समर्थन करती है।

उदाहरण के लिए, ट्रम्प प्रशासन ने “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत कई संरक्षणवादी व्यापार नीतियां लागू कीं, जैसे कि उच्च शुल्क और व्यापार बाधाएं. इन नीतियों का उद्देश्य अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना था. इन नीतियों का उद्देश्य “महान बनाने की नीति” के हिस्से के रूप में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना था.

“अमेरिका फर्स्ट” और “महान बनाने की नीति” दोनों विवादास्पद हैं। कुछ लोग मानते हैं कि ये नीतियां अमेरिका के लिए फायदेमंद हैं, जबकि अन्य लोग मानते हैं कि वे अमेरिका के लिए हानिकारक हैं.

उदाहरण के लिए, “अमेरिका फर्स्ट” नीति के कुछ आलोचक मानते हैं कि यह नीति अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ संबंधों को कमजोर करती है और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बाधित करती है. “महान बनाने की नीति” के कुछ आलोचक मानते हैं कि यह नीति नस्लवादी है और कुछ समूहों को बाहर करती है.

 

ट्रंप के अमेरिका फर्स्ट का अर्थ निस्संदेह अमेरिकी राष्ट्रवाद का समर्थन है. लेकिन क्या यह अलग-थलग रहने का प्रतीक है? ऐसा कहना कुछ ज्यादा ही हो जाएगा. अमेरिका बाकी विश्व से जुड़ा रहता है. रिश्तों की शर्तें दोबारा लिखी भर जा रही हैं. मूल्यों को देश के राजनीतिक और आर्थिक हितों के बाद जगह दी जा रही है.

 

ट्रंप को लगता है कि अमेरिका फर्स्ट नीति की जीत हो रही है. दोबारा बातचीत में उत्तर अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते (नाफ्टा) अमेरिका के पक्ष में रहा तो उन्हें यह भरोसा हो गया. दुनिया को लग रहा है कि अमेरिका फर्स्ट नीति का मतलब यह है कि मुफ्त में अब कुछ नहीं मिलेगा. ट्रंप यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि इतने वर्षों तक अमेरिका को बेवकूफ बनाया गया और अब यह सिलसिला रुकना चाहिए.

अमेरिका के पुराने साथी भी ट्रंप की नीतियों पर भ्रम में हैं. अमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापार प्रतिबंधों ने दोस्तों और दुश्मनों को बराबर नुकसान पहुंचाया है.

जी-20 देशों के समूह की दुर्दशा है. वे दिन गुजर गए, जब जी-20 वैश्विक आर्थिक मसलों पर एकमत से काम करता था; ट्रंप ऐसी किसी भी बात पर राजी नहीं होंगे, जो अमेरिका फर्स्ट के पैमाने पर खरी नहीं उतरती हो.

ट्रंप अमेरिका की एक और प्रतिष्ठित संस्था ‘न्यायपालिका’ से भी भिड़ चुके हैं. उन्होंने अमेरिकी अदालत के नौवें सर्किट को ‘बरबाद’ करार दिया क्योंकि वह प्रशासन की नीतियों को पलटता रहता है.

ट्रंप ने अवैध आव्रजन यानी घुसपैठ को अपनी अमेरिका फर्स्ट विदेश नीति का केंद्रबिंदु बना लिया है.

ट्रंप ने दूसरी बार विजय होने के तत्काल बाद अमेरिका में शरण मांगने वाले हजारों लोगों को रोकने के लिए 5000 जवानों को अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर भेजकर जता दिया कि अवैध घुसपैठ से राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है और वे इसे सख्ती से रोकेंगे.

 

अमेरिकी विदेश नीति में मानवाधिकारों का कितना महत्व है? इस प्रश्न पर राष्ट्रपति ट्रंप दो टूक लहजे में कहते रहे हैं कि विदेश नीति के जिस अमेरिका फर्स्ट मॉडल के साथ वह काम कर रहे हैं, उसमें मानवाधिकारों को दोयम दर्जे पर ही रहना होगा.

 

अमेरिकी मीडिया के कुछ वर्गों ने अमेरिकी विदेश नीति में मानवाधिकारों के मूल्यों के क्षरण के लिए राष्ट्रपति की आलोचना की. लेकिन यह आक्रोश भी मोटे तौर पर सांकेतिक और दोहरे मानदंडों से भरा रहा.

 

ट्रंप पर मानवाधिकारों के मामले में रंग बदलने का आरोप नहीं लगाया जा सकता. अमेरिका ने मानवाधिकारों को हमेशा ही विदेश नीति के सुविधाजनक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. अतीत में भी अमेरिकी प्रशासन ने अपने फायदे के लिए भू-राजनीति के हिसाब से सैन्य तानाशाहों तथा दबंगों का साथ दिया है और उन्हें पाला-पोसा है. पश्चिम एशिया जीता-जागता उदाहरण है. पाकिस्तानी सैन्य तानाशाहों का समर्थन दशकों से अमेरिकी नीति का बुनियादी सिद्धांत रहा है.

दुर्लभ खनिज की चाहत में रूस यूक्रेन युद्ध को रोकने में यूरोप के हितों की अनदेखी करनी हो या हालिया भारत पाकिस्तान युद्ध रोकने में श्रेय लेने का मामला हो या फिर सीरिया के राष्ट्रपति जो अमेरिका की आतंकी लिस्ट में करोड़ों के इनामी आतंकी थे से हाथ मिलाने का मामला हो ट्रंप आगे बढ़ कर अपने आपको विश्व पिता की तरह प्रस्तुत करने से नहीं चूक रहे हैं.

विश्व की 30% धनराशि वाले यहूदी हो या करीब इतने ही धन वाले अरेबियन शासक हो सभी के ट्रंप प्रिय बन गए प्रतीत होते है.

 

इसलिए यदि ट्रंप अमेरिका के हितों को सबसे आगे रखते हैं तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए. अंतर केवल यह है कि इस मामले में वह एकदम मुंहफट और निडर हैं.

लेकिन उनकी कथनी में यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका फर्स्ट नीति का स्वयं अमेरिका पर और पूरी दुनिया पर क्या असर होगा? अमेरिका और चीन के बीच हुए व्यापार युद्ध के विश्व बाजार में परिणाम और बाद में चीन से समझौता भी काफी कुछ कहता हैं.

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