जेतपुर समेत पुरे सौराष्ट्र, गुजरात में इमाम हुसैन की याद में निकला ताज़िया जुलूस।
सौराष्ट्र के धोराजी, राजकोट, जुनागढ़, जामनगर, में हिंदू मुस्लिम एकता के साथ निकला ताज़िया जुलूस।
शोएब म्यानुंर जेतपुर

मोहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महिना है। यह वह महिना है जब पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ शहीद हो गए थे, उनकी शहादत की याद में इस महीने की शुरूआत में दस दिन तक शिया मुस्लिम इमाम हुसैन की याद में शौक (मातम) मनाते हैं। सुन्नी मुस्लिम समाज के लोग दुआए आशुरा पढ़ते नफील नमाज़े पढ़ते और लंगर खाना, सरबत पीलाकर, दुआएं मांग ते हैं कई शहरों में जगह जगह ताजिया जुलूस निकाला जाता है। ताजिया बनाने के लिए हिंदू मुस्लिम एकता के साथ ताजिया बनाया जाता है। ताजिया बनाने में हिंदू भाइयों का भी साथ और सहकार मिलता है, खास तौर पर जेतपुर में साड़ी के कारखाने के कारीगर हैं और यहां के ताज़िया कलात्मक तरीके से बनाए जाते हैं। पुरे सौराष्ट्र जेतपुर के ताज़िए कलात्मक तरीके से बनाए जाते हैं।
महात्मा गांधीजी बताते हैं की कास मेरे पास इमाम हुसैन और उनके 72 साथी होते तो अंग्रेजो से भारत को 24 घंटे में आज़ाद करवा लेते।
मोहर्रम कोई खुशीयों का त्योहार नहीं है बल्कि मातम (गम) का दिन है। मोहर्रम एक ऐसा महिना है, जिसे मुस्लिम समाज के लोग इमाम हुसैन और उनके 72 साथीयों की शहादत के गम में मनाते है। मोहर्रम के दिन इमाम हुसैन मोहर्रम महीने का 10वें दिन इस्लाम को बचाने के लिए शहीद हो गए।
ये हिजरी संवत का प्रथम महिना है जिसे इस्लामिक नया साल भी कहते है। ये दिन मोहर्रम महीने का 1 ला दिन होता है। मोहर्रम की 1 तारीख हर साल बदलती रहती है क्युकी इस्लाम का कैलेंडर एक लूनर कैलेंडर होता है जो चांद दिखने के बाद सूरु होता है। मोहर्रम माह से ही इस्लामिक कैलेंडर की शुरूआत होती है। और जिलहज से साल पुरा होता है।
ये दो दिन शोहदाए कर्बला की याद में लोग रोज़ा रखते हैं। सब जगह लंगर खाना, खीलाए जाते हैं सरबत, और पानी, भी पीलाए जाते हैं। प्यासों को पानी पीलाया जाता है। सरबत पिलाते हैं। भुखे को खाना खिलाया जाता है। और दुआएं आशुरा पढ़ी जाती है। नमाज़े पढी जाती है और खुब अल्लाह की बंदगी की जाती है।
