आलीराजपुर अक्टूबर। फतेह क्लब और उससे जुड़े सार्वजनिक खेल परिसर की भूमि को लेकर सामने आए राजस्व विभाग के दस्तावेज वाले रिकॉर्ड जिले के एकमात्र बहुउपयोगी सार्वजनिक खेल मैदान को निजी संपत्ति घोषित करने की पूरी साजिश का सनसनीखेज पर्दाफाश करते हैं। यह पड़ताल नगरपालिका के 5 सितंबर 2024 के पत्र क्रमांक 4015, 28 अक्टूबर 1972 के पंजीकृत दानपत्र क्रमांक 114, स्वर्गीय श्रीमंत कमलेंद्र सिंह की 3 अगस्त 2022 की विवादित वसीयत के प्रस्तुत अंश, तहसीलदार हर्षल बहरानी के 9 सितंबर 2024 के नामांतरण आदेश और वर्तमान खसरे पर आधारित है। नगरपालिका के पक्ष में पंजीकृत गिफ्ट डिड में फतेह क्लब खेल परिसर के अधिकांश हिस्से के दावे के बावजूद सार्वजनिक परिसर को तुषार सिंह के नाम से निजी संपत्ति करार दिया हैं, जिसे बेच खाने की फ़िराक में जागीरा गैंग लगी हुई हैं।
राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में जन उपयोगी संपत्तियों तथा पुरातत्व महत्व सहित शासकीय भूमि को निजी संपत्ति करार देने की साजिश के खिलाफ तथा राजस्व प्रविष्टि रोकने के लिए तत्कालीन समय में भी वरिष्ठ पत्रकार और जनप्रतिनिधि विक्रम सेन ने सार्वजनिक रूप से समाचारों के माध्यम से गंभीर सवाल उठाए थे। तब प्रशासनिक शक्ति का दुरूपयोग करने में माहिर अभय बेडेकर, जागीरा गैंग के निर्णयकर्ताओं और घोर लालची लाभार्थी तीनों के जहरीले गठबंधन ने कानून कायदो नियमों को ताक पर रख कर मनमाने तरीके से राजस्व रिकॉर्ड में खरबों की शाही पुश्तैनी संपत्तियों के साथ साथ शासकीय प्रशासकीय और जन सरोकारों वाली भूमि को भी निजी नाम से करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थीं, अब परिणाम सामने है, कोई रुकावट नहीं है।
फर्जी आधार पर, साजिशन स्थापित किए जा चुके राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर इस निजी संपत्ति यानि फतेह क्लब खेल मैदान परिसर को भवनों सहित आसानी से बेचा जा सकता हैं।
विदित हो कि इसी माह एसडीएम कार्यालय ने संदिग्ध वसीयत के आधार पर बेडेकर तथा जागीरा गेंग के दबाव प्रभाव और रिश्वत लेकर नायब तहसीलदार यानि प्रभारी तहसील दार हर्षल बहरानी द्वारा किए गए घोर विवादित नामांतरण आदेश के खिलाफ विधिक रूप से नामांतरण आदेश के खिलाफ आवेदन सगे वंशजों ने दिया था।
परन्तु कथित वसीयत ग्रहिता के फर्जी जवाबी तथ्यों को जाँचे बगैर ही इस आवेदन को न्यायालय में विचाराधीन बताकर ख़ारिज कर दिया है, जबकि न्यायिक स्टे की अवधि भी पूरी हो गई थी। यानि अब फतेह क्लब खेल मैदान परिसर को बेच खाने की सभी प्रशासनिक और विधिक राह आसान कर दी गई हैं।
विस्तृत जानकारी अनुसार फतेह क्लब की कहानी सितंबर 2024 से शुरू नहीं होती। 1972 के नपा के पक्ष में हुए पंजीकृत दानपत्र में स्पष्ट लिखा है कि संबंधित संपत्ति का कब्जा नगरपालिका परिषद आलीराजपुर को वर्ष 1964 में दिया जा चुका था। दस्तावेज में फतेह क्लब भवन, बैडमिंटन हॉल, खेल मैदान और संबंधित खाली भूमि का उल्लेख है तथा उद्देश्य सार्वजनिक उपयोग के लिए क्लब, खेल मैदान और पार्क बताया गया है। नगरपालिका द्वारा इनके प्रबंधन का प्रावधान भी दर्ज है। दानपत्र की संपत्ति-अनुसूची में गिफ्ट डिड के अलावा शेष बची भूमि जो बैडमिंटन हॉल के उत्तर की ओर दाता की विशेष स्वामित्व वाली होगी। इस निजी भूमि का माप उत्तर-दक्षिण 111 फुट और पूर्व-पश्चिम 549 फुट दिया गया है, जिसकी आयताकार गणना लगभग 0.5661 हेक्टेयर बनती है।
यह दानपत्र अभय सिंह द्वारा सुरेंद्र सिंह की ओर से मुख्तारनामे के आधार पर 28/10/1972 को निष्पादित हुआ था।
स्वर्गीय श्रीमंत कमलेंद्र सिंह की कथित संदिग्ध वसीयत के प्रस्तुत पृष्ठ पर 3 अगस्त 2022 की तारीख है, जिसमें पूर्व वसीयतों को निरस्त कर अंतिम वसीयत बताने का कथन है। इस वसीयत की प्रामाणिकता पर आपत्तिकर्ताओं ने जिला आलीराजपुर के प्रशासन के समक्ष गंभीर आरोप लगाए थे, जिसमें 89 वर्षीय, कैंसरग्रस्त, अशक्त और मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति के नकली हस्ताक्षर होने से यह वसीयत फर्जी करार दी थी, परन्तु तब से लेकर आज दो साल बाद तक भी लोक के लिए समर्पित कहे जाने वाला प्रशासन कथित वसीयत कर्ता श्रीमंत कमलेंद्र सिंह की देह का पता लगाने तथा नामांतरण के आरोपों की जांच करने तक में विफल रहा हैं।
प्रस्तुत वसीयत के पृष्ठ क्रमांक 7, के खंड ‘k’ में खंडवा-बड़ौदा रोड के किनारे, केशव नगर के दक्षिण और क्रिकेट ग्राउंड के उत्तर स्थित भूमि का वर्णन है, जिसका माप पूर्व-पश्चिम 549 फुट और उत्तर-दक्षिण 111 फुट है तथा इसे तुषार सिंह को देने की बात लिखी है। यह खंड सर्वे नंबर 128 में है। नपा को निष्पादित दानपत्र और वसीयत दोनों में समान 111×549 फुट का माप मिलना महत्वपूर्ण दस्तावेजी संबंध है। इतना ही क्षेत्र इस कथित लाभार्थी के नाम से किया जाना था।
बावजूद इसके नपा के पक्ष में पंजीकृत गिफ्ट डिड वाले जनउपयोगी फतेह क्लब खेल परिसर की एक एक इंच भूमि और भवनों वाले क्षेत्र को भी जागीरा गेंग के मोहरे बेडेकर और मातहत हर्षल बहरानी ने निजी नाम से कर दिया है।
अब यक्ष प्रश्न यह है कि इस सीमित भू भाग के विवरण को परे हटाकर नपा के पक्ष यानि स्वामित्व की भूमि को निजी करने का आधार क्या था?
आधार यह माना जा सकता हैं कि जब जनता लोक हितैषी मुद्दों पर उदासीनता बरतती हैं और कुछ तथाकथित बड़े तत्व निजी स्वार्थ के चक्कर में भ्रष्टाचार के पिस्सुओं को सर आँखो पर बिठाते है तो फ़िर ऐसी साजिशे अंजाम दी जाती हैं।
बता दें कि तुषार सिंह के 8 अगस्त 2024 के नामांतरण आवेदन में कमलेंद्र सिंह की मृत्यु 6 जुलाई 2024 लिखी है। आवेदन में पांच गांवों के अनेक सर्वे नंबर (ग्राम राक्सा में सर्वे 128 सहित) अपने नाम दर्ज करने की मांग की गई थी। इसमें “समस्त कृषि भूमियां व निर्मित बिल्डिंग” का उल्लेख है, लेकिन सर्वे 128 के सामने अलग क्षेत्रफल नहीं लिखा। संलग्नकों में वसीयत और खसरा नकल बताई गई। 21 अगस्त 2024 को यानि नामांतरण पर आपत्ति की समय सीमा से एक दिन पूर्व ही रक्त वंशजों ने कलेक्टर अभय बेडेकर और तहसीलदार हर्षल बहरानी को रसीद सहित पचासों पेज के दस्तावेजों के साथ विस्तृत आपत्तियां दीं, जिनमें पारिवारिक अधिकार, वसीयत की प्रामाणिकता के संबंध में गंभीर प्रश्न, कथित वसीयत कर्ता श्रीमंत कमलेंद्र सिंह के मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्य, संदिग्ध स्टांप पेपर, गलत तरीके से केंसर शुदा देह का दो दिन बाद सुनियोजित साजिश के तहत देह दान आदि के तथ्यों द्वारा नामांतरण रोकने की मांग शामिल थी, उस समय भी विक्रम सेन ने अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए लगातार इस साजिश के खिलाफ समाचारों का प्रकाशन प्रसारण किया था परन्तु जागीरा गेंग के मोहरे बेडेकर ने कई फर्जी मामलों में विक्रम सेन को फंसा कर खरबो रुपए की संपत्ति हड़पने वाली इस साजिश को रोकने के प्रयास से दूर करने की भरपूर कोशिश की थी।
परन्तु विक्रम सेन अपने दायित्व पर टिके रहे।
इसी बीच 5 सितंबर 2024 को नगरपालिका राजस्व शाखा का पत्र क्रमांक 4015 जारी करवाया, जिसमें सर्वे 128 की 2.6790 हेक्टेयर भूमि को फतेह क्लब ग्राउंड बताते हुए 1972 के दानपत्र के आधार पर नगरपालिका के नाम दर्ज करने का अनुरोध किया गया। 2011 और 2012 के पुराने पत्रों का भी उल्लेख है। पत्र तहसीलदार को संबोधित था और इसकी प्रतिलिपि कलेक्टर, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व तथा जिला शहरी विकास अभिकरण को भेजी गई। तत्कालीन मुख्य नगरपालिका अधिकारी के नाम से जारी यह पत्र नपा परिषद के नेता प्रतिपक्ष विक्रम सेन के आग्रह के बाद यह पत्र जारी हुआ था। मात्र चार दिन बाद, 9 सितंबर 2024 को तहसीलदार हर्षल बहरानी के आदेश (प्रकरण 0669/अ-6/2024-25) से सर्वे 128 का पूरा 2.6790 हेक्टेयर (26,790 वर्गमीटर) तुषार सिंह के नाम दर्ज करने का निर्देश दिया गया। आदेश के पांच पृष्ठों में छह व्यक्तियों की आपत्तियां दर्ज हैं और आदेश स्वयं आपत्तियों की मौजूदगी स्वीकार करता है, लेकिन नगरपालिका के दस्तावेजी दावे और दानपत्र का स्पष्ट निराकरण उपलब्ध भाग में नहीं हैं।
वसीयत के खंड ‘k’ की आयताकार गणना लगभग 0.5661 हेक्टेयर है, जबकि आदेश का क्षेत्रफल 2.6790 हेक्टेयर है—लगभग 4.73 गुना। दोनों के बीच गणितीय अंतर लगभग 2.1129 हेक्टेयर (21,128 वर्गमीटर) बनता है। सीमित भूभाग के वर्णन से पूरे सर्वे की प्रविष्टि तक पहुंचने का अभिलेखीय आधार क्या था? आवेदक व्यापक मांग कर सकता है, लेकिन उसका स्वीकार होना दस्तावेजी आधार पर निर्भर करता है।
वर्तमान खसरे में 4 फरवरी 2025 के अनुविभागीय अधिकारी आदेश का भी संदर्भ है। 18 जून 2025 को दीवानी प्रकरण RCSA/21/2025 दाखिल हुआ। 7 अप्रैल 2026 को जिला न्यायाधीश द्वितीय, आलीराजपुर ने छह माह का अंतरिम निषेधाज्ञा आदेश दिया, जिसमें संबंधित संपत्तियों का विक्रय या अन्य अंतरण रोका गया। यह स्टे लगभग 6 अक्टूबर 2026 को समाप्त हो गया। इसी माह एसडीएम कार्यालय ने 9 सितंबर 2024 के नामांतरण आदेश के खिलाफ आपत्ति आवेदन खारिज कर दिया। अब सार्वजनिक खेल परिसर, दानपत्र में उल्लेखित दो सार्वजनिक रास्तों और नगरपालिका के प्रबंधन वाले हिस्से पर निजी प्रविष्टि बनी हुई है तथा बेचने में रुकावट कम हो गई है।
प्रस्तुत खसरे में सर्वे 128 पर तुषार सिंह का नाम और उपयोग “कृषि” दर्ज है। “आबादी (गांव ठान) 0.0690” की टिप्पणी 690 वर्गमीटर की भी दर्ज है।
सर्व विदित है कि फतेह क्लब परिसर में नियमित खेल, टूर्नामेंट, बच्चों का अभ्यास, बुजुर्गों की सैर, महिलाओं का सुरक्षित घूमना और दशहरा दहन होता रहा है। ऐसे खुले मैदान का नुकसान केवल जमीन की कीमत से नहीं, आम जनता की सुविधा से जुड़ा है।
तत्कालीन कलेक्टर अभय बेडेकर को पत्र की प्रतिलिपि मिली, तहसीलदार हर्षल बहरानी ने आदेश पारित किया और लाभार्थी तुषार सिंह को प्रविष्टि मिली। नगरपालिका के दावे पर क्या कार्यवाही हुई, जन उपयोगी फतेह क्लब के दानपत्र का मूल्यांकन शून्य कैसे हुआ? वसीयत में उल्लेखित भूमि की सीमा को क़रीब पांच गुणा करने का अंतर कैसे तय हुआ ? तथा आपत्तियों का निराकरण पर्याप्त था या नहीं? इन सवालों का जवाब फतेह क्लब बिक जाने के बाद भी अनसुलझा रहेगा।
सार्वजनिक हित के दावे के बावजूद निजी लाभार्थी के पक्ष में कार्यवाही पूरी तरह सोची समझी साजिश के तहत आगे बढ़ाई गई और बीते 2 साल से वरिष्ठ पत्रकार और जनप्रतिनिधि विक्रम सेन सहित जागरूक रक्त वंशजों द्वारा अथक प्रयास और अनेक फ़र्ज़ी प्रकरणों सामना करने के बावजूद स्टे आदि कार्यवाही से रोका गया बावजूद इसके की राजस्व विभाग के ऊपर से नीचे तक के अधिकारी इस साजिश में पूरी तरह नतमस्तक रहे।
जनहित की भूमि को बेच खाने देने से परहेज़ करने वाले प्रशासन और लाभार्थी पक्ष की प्रतिक्रिया अभी उपलब्ध नहीं हो सकीं हैं।
आम नागरिक जानना चाहते हैं कि उनके एकमात्र सार्वजनिक खेल परिसर पर कौन-सा अधिकार किस दस्तावेज पर स्वीकार किया गया?
या तो राजस्व विभाग आलीराजपुर के महान प्रतापी अधिकारी गण इस जनहित की भूमि को नपा कार्यालय आलीराजपुर के नाम करें और कथित लाभार्थी बिहारी बाबे के नाम से तत्काल डिलीट करे अन्यथा इसके बिक जाने के बाद नौकरी शुदा राजस्व अधिकारी फाइल फाइल खेलते रहेंगे, जैसे अब तक खेल रहे हैं आम जनता तथा स्थानीय प्रशासन को हुए अपरिमित नुकसान की कभी भी पूर्ति नहीं हो सकती हैं।
*(स्रोत: प्रस्तुत शासकीय दस्तावेज, नगरपालिका पत्र, 1972 का दानपत्र, वसीयत के प्रस्तुत अंश, नामांतरण आदेश और न्यायालय आदेश। संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो सकीं हैं।)*
कल पढ़िए एक और सार्वजनिक प्रशासकीय संपत्ति को निजी संपत्ति करार देने की साजिश का सनसनीखेज पर्दाफाश करती खबर।







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