तत्कालीन कलेक्टर अभय बेडेकर और नामांतरण अधिकारी हर्षल बहरानी की भूमिका की आपराधिक एवं विभागीय जाँच की मांग
विक्रम सेन
आलीराजपुर।
आलीराजपुर रियासत की ऐतिहासिक शाही संपत्तियों से जुड़े विवाद में वर्ष 1972 के पंजीकृत विक्रयपत्र, फतेह क्लब के दानपत्र, पुराने राजस्व अभिलेखों तथा वर्ष 2026–27 की डिजिटल हस्ताक्षरित खसरा नकल से अनेक गंभीर विधिक गड़बड़ी और आपराधिक कृत्य सामने आए हैं।
लगभग ₹1,000 से ₹1,200 करोड़ मूल्य की बताई जा रही इन संपत्तियों के विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वर्ष 2022 की विवादित वसीयत के आधार पर वर्ष 2024 में निजी नामांतरण करते समय नगरपालिका की पूर्व में खरीदी अथवा दान में प्राप्त संपत्तियों, सार्वजनिक रास्तों और धार्मिक स्थलों से संबंधित अधिकारों की विधिवत जाँच की गई थी?
इस पूरे घटनाक्रम में तत्कालीन कलेक्टर अभय बेडेकर तथा तत्कालीन नायब तहसीलदार हर्षल बहरानी के निर्णयों की भूमिका विशेष जाँच का विषय है।
मामले में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, पद के दुरुपयोग और किसी निजी व्यक्ति को अनुचित लाभ पहुँचाने के गंभीर आपराधिक कृत्य को सिद्ध करने के लिए संबंधित अधिकारियों के दोषपूर्ण आदेश, नोटशीट, डिजिटल रिकॉर्ड, दस्तावेजों की जानकारी और निर्णय प्रक्रिया की स्वतंत्र जाँच आवश्यक है।
नामांतरण पहले, सर्वे रिकॉर्ड में परिवर्तन बाद में, तत्कालीन प्रशासन जवाब दे!
वर्ष 2026–27 की डिजिटल हस्ताक्षरित खसरा नकल में राजवाड़ा परिसर से संबंधित सर्वे नंबर 140/1/1 का क्षेत्रफल 2.2170 हेक्टेयर तथा भूमिस्वामी के रूप में तुषार सिंह, निवासी देवगढ़ बारिया, गुजरात का नाम दर्ज बताया गया है।
रिकॉर्ड में सामने आया प्रशासनिक घटनाक्रम इस प्रकार है:
22 अगस्त से लेकर 5-6 सितम्बर तक विभिन्न 7 आपत्ति तहसील कार्यालय और कलेक्टर बेडेकर को प्रस्तुत की गई जिसमें नपा परिषद आलीराजपुर भी शामिल थीं।
9 सितंबर 2024: तहसील स्तर पर विवादित नामांतरण आदेश।
23 सितंबर 2024: कलेक्टर न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 0311/ब-121/2024-25 से संबंधित भू-अभिलेख कार्रवाई।
7 नवंबर 2024: उसी कलेक्टर प्रकरण के आधार पर खसरा नंबर 140/1/1 जोड़े जाने की प्रविष्टि।
21 नवंबर 2024: तहसीलदार न्यायालय के प्रकरण क्रमांक 0669/अ-6/2024-25 के आधार पर अभिलेख अद्यतन।
5 मई 2025: तहसीलदार प्रकरण क्रमांक 0053/अ-6(अ)/2024-25 के आधार पर खसरा टिप्पणी में परिवर्तन।
यह क्रम बताता है कि सितंबर 2024 में नामांतरण आदेश के बाद भी संबंधित राजस्व अभिलेखों में महत्वपूर्ण कार्रवाइयाँ जारी रहीं।
सबसे गंभीर सवाल है कि 9 सितंबर 2024 को नामांतरण आदेश पारित करते समय संबंधित सर्वे नंबर की वास्तविक अभिलेखीय स्थिति क्या थी?
यदि उस समय सर्वे निष्क्रिय था, तो नामांतरण का आधार क्या था?
राजवाड़ा और बावड़ी भी कृषि भूमि! राजस्व रिकॉर्ड में विरोधाभास
सर्वे नंबर 140/1/1 का कुल क्षेत्रफल 2.2170 हेक्टेयर दर्ज है।
प्रस्तुत खसरा विवरण के अनुसार टिप्पणी कॉलम में आबादी 2.200 हेक्टेयर और बावड़ी 0.017 हेक्टेयर दर्ज है। दोनों का योग कुल क्षेत्रफल के बराबर है।
इसके बावजूद भूमि का वर्गीकरण कृषि के रूप में प्रदर्शित बताया गया है।
यहाँ प्रश्न उठता है कि जिस भूमि पर राजवाड़ा परिसर, आबादी और बावड़ी दर्ज हैं, उसका कृषि वर्गीकरण किस राजस्व प्रावधान और किस अभिलेखीय आधार पर बनाए रखा गया?
उस स्थिति में जबकि फर्जी वसीयत में अधिकांश संपत्ति को निजी संपत्ति करार देते हुए बेच खाने के लिए लिख लिया गया हैं।
1972 की रजिस्ट्री से नगरपालिका ने खरीदी थी राजमहल परिसर की भूमि!
राजमहल परिसर से संबंधित वर्ष 1972 का पंजीकृत विक्रयपत्र इस विवाद में अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
इसमें पुराने राजमहल परिसर के दक्षिणी भाग में लगभग 9,150 वर्गफुट भूमि नगरपालिका आलीराजपुर को ₹8,385.74 के विशेष रियायती मूल्य पर विक्रय किए जाने का उल्लेख है।
विक्रयपत्र में संपत्ति की चतुर्सीमा के अनुसार उत्तर में सड़क, दक्षिण में विक्रेता की पक्की दीवार, पूर्व में खुला राजमहल परिसर तथा पश्चिम में सभा-मंडप के पीछे सार्वजनिक सड़क दर्ज है।
इससे संबंधित क्षेत्र में दशकों पहले सार्वजनिक रास्तों के अस्तित्व का दस्तावेजी आधार मिलता है।
20 फुट चौड़ी सड़क और सार्वजनिक हित की शर्तें
विक्रयपत्र में पुराने राजमहल के द्वार से विक्रय की गई भूमि तक सड़क बनाने तथा सभा-मंडप के पूर्वी हिस्से में 20 फुट चौड़ी सड़क की व्यवस्था का उल्लेख है।
सड़क के दोनों ओर नालियाँ बनाने और सार्वजनिक हित में सड़क के प्रबंधन संबंधी शर्तें भी दर्ज हैं।
यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न है कि वर्ष 2024 में निजी नामांतरण से पहले इस पंजीकृत विक्रयपत्र और उसके संलग्न नक्शे का परीक्षण किया गया था या नहीं।
यदि वर्ष 1972 में नगरपालिका को बेची गई भूमि का कोई हिस्सा वर्ष 2024 में किसी निजी व्यक्ति के नाम दर्ज किया गया है, तो उस प्रविष्टि की वैधानिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े हैं।
फतेह क्लब: दान में मिली सार्वजनिक संपत्ति का अधिकार किसके पास?
फतेह क्लब से संबंधित सर्वे नंबर 128 का वर्तमान क्षेत्रफल लगभग 2.6790 हेक्टेयर बताया गया है।
28 अक्टूबर 1972 के पंजीकृत दानपत्र से संबंधित उपलब्ध विवरण के अनुसार फतेह क्लब भवन, बैडमिंटन हॉल, खेल मैदान और संबंधित भूमि नगरपालिका को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए दिए जाने का उल्लेख है।
इससे यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वर्ष 2024 के नामांतरण में दान की गई भूमि और शेष निजी भूमि का पृथक निर्धारण किया गया था या नहीं।
विदित हो कि विवादित वसीयत में संपूर्ण सर्वे नंबर 128 का स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
जबकि संपूर्ण सर्वे का नामांतरण किया गया, तो दानपत्र की सीमाओं, पूर्ववर्ती स्वामित्व और वसीयतकर्ता के वास्तविक अधिकार का परीक्षण किस आधार पर हुआ?
इस प्रश्न का उत्तर मूल दानपत्र, उसके संलग्न नक्शे, पुराने खसरे तथा नामांतरण आदेश के तुलनात्मक परीक्षण से मिल सकता है।
सर्वे नंबर 129 और 145: सार्वजनिक रास्तों पर निजी स्वामित्व के सवाल
सर्वे नंबर 129, रकबा 0.3680 हेक्टेयर में सार्वजनिक रास्ते, सन 1954-55 के खाता खसरे और राजस्व नक्शे से स्पष्ट होते है।
वहीं ग्राम राक्सा के सर्वे नंबर 145 का क्षेत्रफल लगभग 0.0200 हेक्टेयर, अर्थात लगभग 2,153 वर्गफुट बताया गया है।
कई दशक से इसका उपयोग स्थानीय रहवासियों द्वारा पुरानी सार्वजनिक गली के रूप में होता रहा है, जबकि वर्तमान रिकॉर्ड में इसे निजी कृषि भूमि दर्शाकर तुषार सिंह का नाम दर्ज किया गया है।
यदि यह भूमि वास्तव में सार्वजनिक रास्ता है, तो उसके निजी नामांतरण से पहले रास्ते की कानूनी स्थिति, नगरपालिका के अधिकार, पुराने नक्शे तथा आसपास के निवासियों के आवागमन के अधिकारों का परीक्षण आवश्यक था।
वर्ष 1972 के विक्रयपत्र में भी राजमहल परिसर के आसपास सार्वजनिक 20 फिट चौड़े रास्तों और उसके आसपास नाली निर्माण हेतु नपा को सौंपने का उल्लेख है।
हनुमान मंदिर और बावड़ी: धार्मिक संपत्तियों की स्थिति का परीक्षण हुआ या नहीं?
सर्वे नंबर 142/1 का क्षेत्रफल लगभग 0.0890 हेक्टेयर बताया गया है।
वर्तमान रिकॉर्ड में इसका वर्गीकरण कृषि और स्वामित्व निजी प्रदर्शित होने का विवरण सामने आया है।
जबकि इस सर्वे क्षेत्र में श्री हनुमान मंदिर स्थित है।
विवादित वसीयत में राजवाड़ा परिसर के शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और बावड़ी के संरक्षण तथा प्रबंधन से संबंधित व्यवस्थाओं का उल्लेख भी बताया गया है।
प्रश्न है कि पहले बेची, धार्मिक मंदिरों हेतु संरक्षित, सार्वजनिक रास्तों और दान की गई संपत्ति वसीयत से दोबारा निजी कैसे हो सकती है?
यदि कोई संपत्ति पहले ही वैध पंजीकृत विक्रयपत्र अथवा दानपत्र से किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को हस्तांतरित हो चुकी है, तो बाद की वसीयत मात्र से उसका स्वामित्व वापस प्राप्त नहीं हो जाता।
इसलिए वर्ष 1972 के विक्रयपत्र, दानपत्र, वर्ष 2022 की विवादित वसीयत और वर्ष 2024 के नामांतरण आदेश का संयुक्त परीक्षण इस मामले में निर्णायक महत्व रखता है।
बेडेकर और बहरानी की आपराधिक स्तर वाली भूमिका की जाँच क्यों आवश्यक?
इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर अभय बेडेकर और नामांतरण अधिकारी हर्षल बहरानी के निर्णयों को लेकर गंभीर तथ्यात्मक सबूत स्पष्ट हैं।
जाँच का प्रमुख विषय यह है कि संबंधित अधिकारियों के सामने कौन-कौन से पुराने अभिलेख उपलब्ध थे, क्या नगरपालिका की संपत्ति के आवेदनों और दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लिया गया था, क्या आपत्तियों की सुनवाई हुई और बाद में राजस्व रिकॉर्ड में किए गए परिवर्तनों का उद्देश्य तथा वैधानिक आधार क्या था।
स्वतंत्र जाँच में यह प्रमाणित होता है कि इस दूषित नामांतरण आदेश से जुड़े अधिकारीयो ने जानबूझकर महत्वपूर्ण दस्तावेज छिपाए, अधिकारों की अनदेखी की, अभिलेखों में अनुचित परिवर्तन कराया अथवा किसी निजी व्यक्ति को अवैध लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से अपने पद का दुरुपयोग किया, तो संबंधित कृत्यों के लिए लागू आपराधिक और भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई अवश्यसंभावी होना है।
लोक उपयोगी भूमियों को आपराधिक षड्यंत्र के तहत निजी नाम से राजस्व प्रविष्टियों की जाँच स्वतंत्र साक्ष्यों और विधिसम्मत जाँच से खुलासा करना आवश्यक है।
तत्कालीन कलेक्टर बेडेकर और मातहत हर्षल बहरानी की आपराधिक कृत्य की भूमिका हेतु उच्चस्तरीय जाँच के लिए दस महत्वपूर्ण सवाल
1. वर्ष 1972 में नगरपालिका को बेची गई 9,150 वर्गफुट भूमि आज किस सर्वे नंबर में दर्ज है?
2. क्या वर्ष 2024 के निजी नामांतरण में इस भूमि का कोई हिस्सा शामिल हुआ?
3. नामांतरण के समय सर्वे नंबर 140/1 की वास्तविक स्थिति सक्रिय थी या निष्क्रिय?
4. 23 सितंबर 2024 और 7 नवंबर 2024 की कार्रवाइयों का मूल आदेश क्या था?
5. 21 नवंबर 2024 और 5 मई 2025 को अभिलेखों में किए गए परिवर्तनों का आधार क्या था?
6. फतेह क्लब की दान में दी गई भूमि का पृथक सीमांकन क्यों और कैसे किया गया?
7. सर्वे नंबर 129 और 145 के सार्वजनिक रास्तों की स्थिति का परीक्षण हुआ या नहीं?
8. हनुमान मंदिर, शिव मंदिर और बावड़ी के अधिकारों एवं सार्वजनिक उपयोग की जाँच की गई थी या नहीं?
9. क्या नगरपालिका को प्रभावित पक्षकार के रूप में सूचना देकर सुनवाई का अवसर दिया गया?
10. तत्कालीन कलेक्टर, नामांतरण अधिकारी तथा अन्य राजस्व कर्मचारियों की प्रत्येक कार्रवाई का अभिलेखीय और कानूनी आधार क्या है?
आलीराजपुर की ऐतिहासिक संपत्तियों का यह विवाद अब केवल शाही उत्तराधिकार अथवा निजी वसीयत का प्रश्न नहीं रह गया है।
यह नगरपालिका की खरीदी संपत्ति, सार्वजनिक उपयोग के लिए दान की गई भूमि, दशकों पुराने रास्तों, धार्मिक स्थलों और नगरवासियों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर सार्वजनिक हित का मामला है।
वर्ष 1972 का पंजीकृत विक्रयपत्र और दानपत्र, वर्ष 2024–25 की राजस्व कार्रवाइयाँ तथा वर्तमान डिजिटल खसरा रिकॉर्ड मिलकर स्वतंत्र, निष्पक्ष और अभिलेख-आधारित जाँच की आवश्यकता सामने रखते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है; जिन संपत्तियों को दशकों पहले जनता के उपयोग के लिए बेचा या दान किया गया था, क्या उनके अधिकारों की रक्षा की गई, या नामांतरण प्रक्रिया में उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया?
इसका जवाब संबंधित अधिकारियों के मूल आदेशों, नगरपालिका के संपत्ति रजिस्टर, पंजीकृत दस्तावेजों, भू-नक्शों और डिजिटल रिकॉर्ड की जाँच से सामने आना चाहिए।
आलीराजपुर की जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी सार्वजनिक संपत्तियाँ आज किसके नाम दर्ज हैं, किस आदेश से दर्ज हैं और उन आदेशों के लिए जिम्मेदार भ्रष्टों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई कब होना है।





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