सुप्रीम कोर्ट में न्यायपालिका के सम्मान पर हमला निंदनीय,

लोकतंत्र की गरिमा के लिए सख्त कार्रवाई जरूरी सुप्रीम कोर्ट हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च स्तंभ है, जहां न्याय की स्थापना की प्रतिज्ञा होती है। परन्तु हाल ही में जो घटित हुआ, वह न केवल हमारे न्यायिक संस्थान की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि लोकतंत्र एवं संविधान के प्रति निष्ठा पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। आदरणीय मा. मुख्य न्यायाधीश श्री भूषणजी गवई साहेब पर वकील द्वारा असभ्य और निंदनीय जूता फेंकने का प्रयास, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है जिसको हम कड़ी निंदा करते हैं।यह घटना न केवल व्यक्तिगत आघात है, बल्कि देश की न्यायपालिका के सम्मान, स्वतंत्रता और सुरक्षा पर हमला है। न्यायालय की पावन दीवारों के भीतर ऐसी हरकतें, न्याय के मंदिर की पवित्रता को कलंकित करती हैं और आम जनता के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास की भावना उत्पन्न करती हैं।हम सरकार, सुरक्षा एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों से कठोरतम कार्रवाई करने का आग्रह करते हैं, ताकि दोषी को जल्द से जल्द दंडित किया जा सके और आगे से ऐसी शर्मनाक घटनाओं को रोकने के लिए उदाहरण प्रस्तुत हो। देश के हर नागरिक को यह समझना होगा कि लोकतंत्र के अनुशासन और न्याय के प्रति सम्मान का पालन करना हमारा कर्तव्य है।मुख्य न्यायाधीश गवई साहेब ने बिना विचलित हुए कार्यवाही जारी रखी, जो उनकी धैर्यशीलता और प्रोफेशनलिज्म का परिचायक है। इस घटना ने यह भी दिखाया कि लोकतंत्र में हिंसा और असभ्यता के लिए कोई स्थान नहीं है। किसी भी विचारधारा या व्यक्तिगत मतभेद के नाम पर अदालत में इस प्रकार का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।हमें सभी नागरिकों, विशेषकर कानूनी पेशेवरों को यह स्मरण कराना होगा कि न्यायपालिका हमारे अधिकारों की संरक्षक है और इसका अपमान हमारे लोकतंत्र के पतन का संकेत होगा। न्याय पालिका का सम्मान करना प्रत्येक भारतीय का नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है।यह समय है कि हम सामाजिक सद्भाव, समानता, और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा हेतु एकजुट हों और न्याय की स्वतंत्रता को सुरक्षित रख सकें। ऐसी घटनाओं से सीख लेते हुए, हमें अपने देश के न्याय संस्थानों का संरक्षण करना होगा ताकि लोकतंत्र के आदर्श सशक्त बने रहें।सुप्रीम कोर्ट जैसे न्याय के मंदिर में किसी भी प्रकार की हिंसा या अनादर को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यह सिर्फ न्यायपालिका या किसी एक न्यायाधीश का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश की न्याय व्यवस्था और उसकी प्रतिष्ठा का प्रश्न है।हमारा समाज तभी मजबूत होगा जब हम अपने धार्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक मतभेदों के बावजूद न्याय और कानून के प्रति समान आदर रखें। ऐसी घटनाएं समाज में नफरत और विघटन बढ़ाने का काम करती हैं, जिनसे बचाव हम सबका प्राथमिक कर्तव्य है।अधिवक्ता राकेश किशोर द्वारा मुख्य न्यायाधीश गवई पर जूता फेंकने का प्रयास न केवल कानून व्यवस्था का उल्लंघन है, बल्कि यह न्यायपालिका में कार्यरत सभी कर्मियों एवं संस्था के प्रति भी गंभीर अभद्रता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने तत्काल प्रभाव से इस वकील को निलंबित कर दिया है, जो एक सही कदम है।न्यायपालिका की सुरक्षा और सम्मान हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है। ऐसे कृत्यों के खिलाफ कठोर और निर्णायक कार्रवाई हमारी न्याय व्यवस्था की प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। हमें मिलकर न्याय की इस पवित्र संस्था की गरिमा बनाए रखनी होगी।समाज के हर वर्ग से अपील है कि वे न्यायपालिका के प्रति सम्मान का भाव रखें और किसी भी प्रकार की हिंसा या अभद्रता से सावधान रहें। यह केवल न्यायपालिका का सम्मान नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की रक्षा का सवाल है।अंत में, हम दोबारा इस बात पर जोर देते हैं कि संविधान, लोकतंत्र, और न्याय के मंदिर की प्रतिष्ठा को बनाए रखना हम सभी का कर्म और कर्तव्य है। कोई भी ऐसा कदम जो इस संतुलन को बिगाड़े, उसकी कड़ी निंदा होनी चाहिए।लोकतंत्र, समानता, और सामाजिक बंधुत्व को बनाए रखना हम सबका जिम्मा है —
इसे कमजोर होने नहीं देना चाहिए।
जफरसिद्दीकी
एडिटर
सेक्रेटरी महा. प्रदेश माॅयनाॅरीटी कांग्रेस
