भारतीय राजनीति बार-बार एक सबक सिखाती है, लेकिन बहुत से लोग उसे सीखने से इंकार कर देते हैं।
Tabish
|
|
— views
सत्ता समर्थक पैदा करती है, विचारधारा सिपाही पैदा करती है।जैसे ही सत्ता चली जाती है, अवसरवादी भी गायब हो जाते हैं। नारे फीके पड़ जाते हैं,भीड़ छंट जाती है,स्वयंभू क्रांतिकारी अपनी अगली राजनीतिक सवारी की तलाश में निकल पड़ते हैं।लेकिन एक वैचारिक आंदोलन जीवित रहता है।लगातार बारह वर्षों से कांग्रेस उस सबसे शक्तिशाली राजनीतिक मशीन का सामना कर रही है, जिसे भारत ने कभी देखा है। सरकारें, एजेंसियाँ, मीडिया तंत्र, अरबों रुपये के प्रचार नेटवर्क, रोज़ाना चरित्र हनन के अभियान और उसके अंत की अनगिनत भविष्यवाणियाँ।फिर भी कांग्रेस खड़ी है।इसलिए नहीं कि उसके पास सत्ता थी।इसलिए नहीं कि उसके पास धन था।इसलिए नहीं कि उसका रास्ता आसान था।वह इसलिए खड़ी है क्योंकि उसकी जड़ें एक ऐसे विचार में हैं, जो किसी भी व्यक्ति से बड़ा है, किसी भी चुनाव से बड़ा है और किसी भी सरकार से बड़ा है।एक ऐसा विचार जिसने भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष किया।एक ऐसा विचार जिसने भारत का संविधान लिखा।एक ऐसा विचार जो मानता है कि भारत हर भारतीय का है, केवल उन लोगों का नहीं जो सत्ताधारी व्यवस्था से सहमत हों।इसीलिए हर कुछ वर्षों में वही भविष्यवाणी सुनाई देती है—"कांग्रेस खत्म हो चुकी है।"और हर कुछ वर्षों में हकीकत वही जवाब देती है—कांग्रेस अब भी मौजूद है।कांग्रेस से निकले अनेक दलों ने वर्षों तक दावा किया कि उन्होंने बेहतर रास्ता खोज लिया है। कुछ ने व्यक्तिपूजा की राजनीति खड़ी की। कुछ ने क्षेत्रीय साम्राज्य बनाए। कुछ ने नारों और आक्रोश के सहारे आंदोलन खड़े किए।लेकिन किसी राजनीतिक दल की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह सत्ता में रहते हुए कैसा प्रदर्शन करता है।असली परीक्षा यह है कि सत्ता खोने के बाद भी क्या वह जीवित रह पाता है।यहीं अंतर स्पष्ट हो जाता है।कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने हार के दौर में संघर्ष किया।कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने आपातकाल के दौर में संघर्ष किया।कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने तब संघर्ष किया जब उनके नेताओं को जेल भेजा गया।कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने तब संघर्ष किया जब पार्टी को समाप्त मान लिया गया।क्योंकि कांग्रेस कभी केवल सत्ता तक पहुँचने का माध्यम नहीं थी। वह एक उद्देश्य थी।और आज इस संघर्ष के केंद्र में राहुल गांधी खड़े हैं।जब दूसरे लोगों ने राजनीतिक सुविधा के अनुसार अपने सिद्धांत बदले, तब राहुल गांधी ने समझौते के बजाय टकराव का रास्ता चुना।उन्होंने बेरोज़गारी की बात तब की, जब ऐसा करना असुविधाजनक था।उन्होंने असमानता की बात तब की, जब वह लोकप्रिय विषय नहीं था।उन्होंने संस्थाओं पर नियंत्रण की बात तब की, जब दूसरे चुप थे।उन्होंने सामाजिक सौहार्द की बात तब की, जब नफ़रत राजनीतिक रूप से लाभदायक बनती जा रही थी।उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी।उनका मज़ाक उड़ाया गया।उन्हें अपमानित किया गया।उन्हें व्यंग्य और कार्टून का विषय बनाया गया।उन्हें कमतर आँका गया।फिर भी हर हमले के साथ उनकी विश्वसनीयता बढ़ती गई।क्योंकि लोग अंततः उस अंतर को पहचान लेते हैं, जो सुर्खियाँ बटोरने वाले नेता और अपने विश्वासों के लिए व्यक्तिगत हमले सहने वाले नेता में होता है।आज राहुल गांधी मीडिया के समर्थन की वजह से नहीं बढ़ रहे हैं। वे मीडिया की शत्रुता के बावजूद आगे बढ़ रहे हैं।वे प्रचार की वजह से नहीं बढ़ रहे हैं। वे इसलिए बढ़ रहे हैं क्योंकि लाखों लोग वहाँ वास्तविकता और ईमानदारी देख रहे हैं, जहाँ आलोचक कभी संदेह पैदा करने की कोशिश करते थे।और यही कारण है कि भविष्य वैचारिक स्पष्टता का है, राजनीतिक भ्रम का नहीं।कांग्रेस परिवार से अलग हुए असंख्य राजनीतिक दलों को स्वयं से एक सरल प्रश्न पूछना चाहिए—यदि उद्देश्य संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की रक्षा करना है, तो फिर विभाजित क्यों रहना?इतिहास बिखराव को पुरस्कृत नहीं करता।इतिहास उद्देश्य की एकता को पुरस्कृत करता है।कांग्रेस केवल एक और विपक्षी दल नहीं है। यह वह मूल राष्ट्रीय आंदोलन है, जिससे इन अधिकांश राजनीतिक धाराओं का जन्म हुआ।प्रयोगों, अहंकार और अंतहीन विभाजनों का समय अब समाप्ति की ओर है।घर वापसी का समय निकट आ रहा है।क्योंकि जब लड़ाई वास्तव में भारत की आत्मा के लिए हो, तब केवल एक ही राष्ट्रीय मंच ऐसा है जिसके पास इतिहास, विचारधारा, संगठन और नेतृत्व है, जो इस संघर्ष को हर राज्य और हर गाँव तक ले जा सकता है।कांग्रेस तब भी जीवित रही जब बहुतों ने उसके समाप्त हो जाने की उम्मीद की थी।और राहुल गांधी के नेतृत्व में वह केवल जीवित ही नहीं है, वह अपनी वापसी की तैयारी कर रही है।Praveen Johri ✍️
How did you feel about this news?

Loading comments...